ब्रह्मर्षि समाज से सम्बंधित ब्लॉग | ब्लॉग लिखने का मेरा मकसद समाज से जुड़े पहलुवों पर शोध करना है, ताकि सही मार्गदर्शन मिले | मेरा इरादा किसी भी धर्म, जाति या व्यक्ति विशेष को ढेस या हानि पहुँचाने का कतई न है | अगर किसी भाई बंधू को मेरे ब्लॉग के लेख से जुड़े हुए सच्चाई से समस्या है, तो मैं इतिहास नहीं बदल सकता, मुझे क्षमा करें | आप से विनती है वर्तमान को सही करने की चेष्टा करें और भविष्य से जोड़कर उज्वल इतिहास का निर्माण करें | आपने अपना बहुमूल्य समय मेरे ब्लॉग को दिया इसके लिए मैं आपका सदा आभारी हूँ | आप अपने विचार कमेन्ट के जरिये व्यक्त करके मेरा मार्गदर्शन कर सकते हैं, मुझे ब्लॉग लेखन में सहायता का अनुभव प्राप्त होगा | पाठकों से अनुरोध है आप लेख का दुरूपयोग न करें | संतोष कुमार (लेखक)

राष्ट्रप्रेम हर नागरिक का कर्तव्य

Wednesday, 14 August 2013

अंग्रेजों के जाने उपरांत जिस आजादी कि हम कल्पना करते रहे, वह केवल सुभाष चन्द्र बोस के जीवित रहते ही मिल सकती थी या .......

राष्ट्रप्रेम में अपनी आस्था रखने वाले देश के उस हरेक नागरिक को चहिए कि भगत, आजाद, सुभाष.... जैसे महान क्रांतिकारियों के राह पर चलना शुरू कर दें... तभी हम भ्रष्टमुक्त भारत की कल्पना कर सकते हैं | जय हिन्द - जय माँ भारती |

-
संतोष कुमार

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राष्ट्र में बढ़ता भ्रस्टाचार, नक्सल, आतंकवादियों गतिविधियाँ और रोकथाम

राष्ट्र में बढ़ते भ्रस्टाचार, नक्सल और आतंकवादियों गतिविधों पर लागम कसने के लिए राष्ट्र के उन सभी सच्चे सपूतों का फर्ज बनता है कि इनके खिलाफ चल रहे आन्दोलन का खुल कर समर्थन करें | जय हिन्द - जय माँ भारती |

- संतोष कुमार

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भारत से जमींदारी प्रथा के खात्मे के महानायक ब्रह्मर्षि शिरोमणि " श्री १०८ दण्डि स्वामी सहजानंद सरस्वती "

Monday, 12 August 2013

किसानों के महानायक के रूप में उभरे भूमिहार ब्राह्मण कुल में पैदा हुए श्री १०८ दण्डि स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ने भूमिहार ब्राह्मणों के सम्मान में " भूमिहार ब्राह्मण परिचय " नामक अपनी अनमोल कृति को समाज में उस समय प्रस्तुत किया जब भूमिहार ब्राह्मण, समाज में अपना विरोधाभास का संकट झेल रहा था | स्वामी जी ने अपने इस पुस्तक को अगले संस्करण में नया नाम दिया " ब्रह्मर्षि वंश विस्तर " | 


मैथिल ब्राह्मणों के पाखण्ड प्रवृति के लोगों की ओर से स्वामी जी के पुस्तक " भूमिहार ब्राह्मण परिचय " का आलोचना करने हेतु " भूमिहार भ्रम भंजन " नामक पुस्तक को प्रकाशित करवाया |
 
कड़े प्रवृति के स्वामी सहजानंद जी चुप कैसे बैठते, उन्होंने उन आलोचक मैथिलों का जवाब अपने नए पुस्तक " मैथिल मान मर्दन " के द्वारा करारा जवाब दिया | स्वामी जी के लिखे पुस्तकों में सच्चाई पाकर अपना मान मर्दन करवा चुके आलोचक मैथिल ब्राह्मणों ने अंततः हार स्वीकार करते हुए चुप बैठना आवश्यक समझा |
 
वैसे आप लोगों को बताना चाहूँगा कि स्वामी जी की कृति के रूप में उनकी पहली पुस्तक " ब्राह्मण समाज की स्थिति " थी | इसके उपरांत " भूमिहार ब्राह्मण परिचय " | स्वामी जी ने कई पुस्तकों की रचना की | किसानों के मान सम्मान को लेकर उनके समबन्ध में भी इनके अनेकों रचनाएँ हैं |


- संतोष कुमार

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मासूम जानवरों के चमड़े से निर्मित जुते आखिर अनिवार्य क्योँ ?



हमारे संस्कृति को धूमिल करने की साजिस अंग्रेजों ने भरपूर रूप से रची और वह साजिस आज तक कायम है |

बचपन से ही हमें स्कूलों में चमड़े के जुते पहनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है और यह सिलसिला आजीवन तक कायम रहता है | ब्राह्मण समाज के बच्चे आखिर क्योँ पहने ऐसे जुते ? सोंचने वाली बात है, सेना - पुलिस, स्कुल - कालेज, आफिस इत्यादि जगहों पर चर्म से निर्मित जुते आखिर अनिवार्य क्योँ ?

एक तरफ जानवरों को बचाने की मुहीम छेड़ी जाती है तो दुसरे तरफ इन जानवरों की हत्या का लाइसेंस का भी आवंटन होता है |

जब कपड़े और रबर से बने जुते विकल्प हैं तो क्योँ न करें इसका खुल कर बहिष्कार |

अगर इन जानवरों के साथ राष्ट्र की संस्कृति को बचाना और साथ ही देश के सबसे बड़े गद्दारों के मुंह पर लगाम लगाना है तो चमड़े से बने वस्तुओं का उपयोग करना हमें बंद करना होगा |

-
संतोष कुमार

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ब्रह्मर्षि समाज को निरंतर अपनी योग्यता का मिशाल कायम करते रहना चाहिए

ब्रह्मर्षि समाज को अपने समाज व राष्ट्र को मजबूती प्रदान करने हेतु जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर अपनी योग्यता का परिचय देते हुए सवर्ण समाज के साथ अन्य समाज की योग्यता को भी ध्यान में रखते हुए एकसाथ मिलकर शंखनाद करने की अवश्यकता है तभी जाकर हमलोग सत्ता का स्वाद ले पाने में सक्षम होंगे |

मैं उस सत्ता के बागडोर कि बात कर रहा हूँ जिसे हम वर्षों से वंचित हैं, आज वहां भ्रस्टाचार की बयार बह रही है | हमें एकसाथ मिलकर भ्रस्टाचार का अंत करना है | इस एकमात्र विकल्प से ही हम राष्ट्र और अपने समाज को बचा पाने में सफल होंगे |

- संतोष कुमार

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बिहार केसरी डा० श्री कृष्ण सिंह

Friday, 8 March 2013

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बिहार केसरी डा० श्री कृष्ण सिंह

बिहार केसरी के नाम से विख्यात एवं आघुनिक बिहार के निर्माता डा० श्री कृष्ण सिंह बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री थे | इनका जन्म २१ अक्टूबर १८८७ ई० को इनके अपने ननिहाल, वर्तमान नवादा जिले के नरहट थाना अंतर्गत खंनवाँ ग्राम में हुआ था |  धार्मिक प्रवृति से परिपूर्ण इनकी माता एवं इनके पूज्य पिताजी श्री हरिहर सिंह एक मध्यम भूमिहार ब्राह्मण, जो ग्राम मउर तत्कालीन मुंगेर जिला और वर्तमान बरबीघा, शेखपुरा जिला से थे |  


महज पाँच साल अवस्था में इनके माताजी की प्लेग नामक बीमारी से मृत्यु हो गई थी | इन्होने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने ग्राम मउर की पाठशाला में प्राइमरी तक ली और आगे की शिक्षा छात्रवृति पाकर जिला स्कूल मुंगेर से पूरी की | सन् १९०६ ई० में पटना कालेज, पटना विश्विद्यालय के छात्र बने | सन् १९१३ ई०. में एम.ए. की डिग्री हासिल करके सन् १९१४ ई० में कलकत्ता विश्विद्यालय से बी. एल. की डिग्री प्राप्त की | अपनी शिक्षा पूरी कर लेने के उपरांत सन् १९१५ ई० में मुंगेर से वकालत की शुरुआत करते हुए समय के साथ वकालत के क्षेत्र में अपना अहम स्थान प्राप्त किया | इसी दौरान ये परिणय सूत्र में बंधे और दो बेटों, शिवशंकर सिंह और बन्दिशंकर सिंह का जन्म हुआ |

विद्यार्थी जीवन से ही डा० श्री कृष्ण सिंह के अन्दर राष्ट्र प्रेम की भावना एवं समाज सेवा कूट – कूट कर भरी थी और ये लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तथा श्री अरविन्द के विचारों से प्रभावित थे | महात्मा गाँधी से  इनकी पहली व्यक्तिगत मुलाकात सन् १९११ ई० में हुई और गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर उनके अनुयायी बन गये |

नव बिहार के निर्माता बिहार केसरी डा० श्री कृष्ण एक महान  शिल्पकार थे इन्होने अपनी अद्भुत कर्मठता और सच्चे लगन से राज्य की बहुमुखी विकास योजनाओं की आधारशिला रखने के साथ बिहार के नव निर्माण का उत्कृष्ट संकलन किया | सत्य और अहिंसा के सिद्धांत में आस्था रखने वाले श्री बाबू स्वतंत्रता - संग्राम के अग्रगण्य सेनानियों में से एक थे | इनका का सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र एवं जन - सेवा के लिये समर्पित था |

डा० श्रीकृष्ण सिंह ने पहली जेल यात्रा सन् १९११ ई० में ब्रिटेन के युवराज प्रिन्स ऑफ वेल्स की भारत-यात्रा के बहिष्कार-आंदोलन के क्रम में की थी । मार्च, १९११ ई० में विजयवाड़ा कांग्रेस के निर्णयानुसार तिलक स्वराज्य फंड के लिए एक करोड़ रूपया एकत्र करने का जब निश्चय किया गया तो बिहार प्रान्तीय कांग्रेस समिति द्वारा निर्मित तिलक स्वराज्य फंड के डा० श्रीकृष्ण सिंह संयोजक बनाये गये ।

श्री बाबु सन् १९१७ ई० में लेजिस्लेटिव कौंसिल तथा सन्  १९३४ ई० में केन्द्रीय एसेम्बली के सदस्य मनोनीत किए गये । बिहार में स्वायत्त शासन की शुरवात श्री कृष्ण सिंह के बिहार प्रधानमंत्री पद के नेतृत्व में १ अप्रैल १९३७ को हुआ, यह वह तारीख थी जिस दिन सन् १९३१ ई० का भारतीय संविधान लागू हुआ था | ७३ वर्षीय श्री बाबु अपने जीवन के अंतिम घडी ३१ जनवरी १९६१ ई० तक सफलतापूर्वक समाज की सेवा में बने रहे | इन्होंने लगभग २४ वर्ष, १ अप्रैल १९३७ से २ अप्रैल १९४६ तक प्रधानमंत्री एवं २ अप्रैल १९४६ से ३१ जनवरी १९६१ तक मुख्यमंत्री के पद पर कार्यरत रहते हुए प्रदेश का मार्गदर्शन किया |

आधुनिक बिहार के जनक श्री बाबू अब हमारे बीच नही हैं, किन्तु उनकी  विचारधाराएं एवं उनके उच्च आर्दश सदैव हमारा मार्ग दर्शन करते रहेंगे । बिहार के नव निर्माण के लिए वे बिहारवासीयों के हृदय में बसने के साथ वे सदा के लिए पूजनीय रहेंगे तथा बिहार सदैव उनका ऋणी रहेगा | ब्रह्मर्षि कुलभूषण को शत शत नमन |

- संतोष कुमार (लेखक)

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